⚠️ भारी स्कूल बैग के कारण बच्चों को हुई समस्याएँ – केस व अध्ययन

 भारी स्कूल बैग के कारण बच्चों को होनेवाली  - केस स्टडी


1. 28 किलो की बच्ची पर 6.5 किलो के बैग (लगभग 24%) का प्रभाव



लखनऊ की 10 वर्षीय कक्षा 5 की छात्रा रिया शर्मा का मामला विशेष रूप से चिंताजनक है। मात्र 28 किलो वजन होने के कारण, उसे रोज़ाना 6.5 किलो का बैग ढोना पड़ता था - जिसके कारण उसके कंधे रगड़ खाते थे, वह आगे की ओर झुककर चलती थी, और उसकी पीठ और मांसपेशियों पर अत्यधिक दबाव पड़ता था। अंततः, केजीएमयू के डॉक्टरों ने बैग के वजन को सीधे तौर पर इसके लिए ज़िम्मेदार पाया।


2. ग्यारह  वर्षीय रवि की रिपोर्ट


रवि मिश्रा (11 वर्ष) को लगातार पीठ के निचले हिस्से में दर्द होने लगा और सीढ़ियाँ चढ़ने में कठिनाई होने लगी - भारी बैग (लगभग 7 किलो) के कारण उसकी रीढ़ की हड्डी में असंतुलन पैदा हो गया।




3. स्कोलियोसिस, मांसपेशियों में सूजन, दर्द


केजीएमयू के अध्ययन में पाया गया कि भारी बैग (बच्चे के वजन का 10-15% से ज़्यादा) स्कोलियोसिस, मांसपेशियों में सूजन, पीठ-कंधे-गर्दन दर्द जैसी समस्याएँ पैदा कर सकता है। भारी बैग वाले छात्रों में पीठ दर्द होने की संभावना 50% ज़्यादा थी।


4. निजी स्कूल बनाम सरकारी स्कूल - तुलनात्मक आँकड़े (ट्रिब्यून)


निजी स्कूलों के 80.2% छात्रों ने भारी बैग की समस्या बताई, जबकि सरकारी स्कूलों में यह संख्या लगभग 69.7% थी।


निजी स्कूलों में, 65.3% छात्र मस्कुलोस्केलेटल दर्द से पीड़ित थे; सरकारी स्कूलों में, यह संख्या 52.9% थी।


62.3% छात्र एक कंधे पर बैग ढोते थे जिससे दर्द और बढ़ जाता था; 66.8% छात्र झुककर बैग ढोते थे।


 5. एसोचैम सर्वेक्षण: 7-13 वर्ष की आयु के बच्चों में रीढ़ की हड्डी में विकृति का जोखिम


एक राष्ट्रीय सर्वेक्षण में पाया गया कि 68% बच्चे (7-13 वर्ष) पीठ दर्द या शरीर में ऐंठन से पीड़ित थे क्योंकि वे प्रतिदिन स्कूल जाते समय अपने कंधों पर अपने वजन का 45% से अधिक भार ढोते थे। इससे आगे चलकर "कुबड़ापन" (काइफोसिस) जैसी समस्याएँ हो सकती हैं।


6. हैदराबाद/गुवाहाटी के छात्रों के व्यक्तिगत अनुभव


अमित गुप्ता (कक्षा 6, गुवाहाटी) प्रतिदिन 7 किलो का भारी बैग ढोते थे, जिसमें 6-8 किताबें, 12 नोटबुक, टिफिन, पानी की बोतल आदि शामिल थे। इसके कारण उनकी मांसपेशियों में खिंचाव और हड्डियों की संरचना में बदलाव आने लगे।


इसके अलावा, डॉक्टरों का कहना है कि ऐसे बच्चों में रीढ़ की हड्डी में विकृति, मांसपेशियों में चोट और स्पॉन्डिलाइटिस जैसी समस्याएँ भी दिखाई देने लगी हैं।

 📌 सारांश: प्रमुख समस्याओं का संग्रह


समस्याओं का विवरण


मांसपेशियों और हड्डियों में दर्द, रीढ़, कंधे और गर्दन में लगातार तनाव

आसन संबंधी विकृतियाँ, स्कोलियोसिस, काइफोसिस, असंतुलन
शारीरिक थकान, पढ़ाई में रुचि की कमी, स्कूल से अनुपस्थिति
दैनिक गतिविधियों में कठिनाई, सीढ़ियाँ चढ़ने में असमर्थता, चलने में असंतुलन
विकास में देरी, विकास मंदता, विटामिन डी की कमी की एक जटिलता

🗣️ छात्रों और अभिभावकों की आवाज़:


> "मैं अपना भारी बैग एक पट्टे पर ढोता था... जिससे मुझे हल्का स्कोलियोसिस हो गया... अब मेरी गर्दन में हर्निया है और पीठ का दर्द हर साल बढ़ता जा रहा है।"


"ऐसा लगता है जैसे इसका वज़न मुझे गिरा देगा... यह मेरे कंधों में बहुत गड़ जाता है और दर्द देता है।"


✅ निष्कर्ष:


भारत में भारी स्कूल बैग का संकट सिर्फ़ एक समस्या नहीं है - यह एक गंभीर स्वास्थ्य और विकास संकट है।


 भारी बैग बच्चों को शारीरिक, मानसिक और शैक्षिक, हर स्तर पर समस्याएँ देते हैं।


राष्ट्रीय और स्थानीय अध्ययनों से पता चलता है कि बैग का वज़न बच्चे के वज़न के 10-15% से ज़्यादा नहीं होना चाहिए।


अब ज़रूरी है कि माता-पिता, शिक्षक, स्कूल और नीति-निर्माता मिलकर तत्काल कार्रवाई करें - ताकि बच्चों का भविष्य स्वास्थ्य और खुशियों से भरा हो, तनाव से भरा न हो।👉 जुड़ें और अपडेट प्राप्त करें:

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